भारत में आरक्षण का इतिहास | Bharat mein aarakshan ka itihaas | History of Reservation in India in Hindi

भारत की संविधान सभा ने अब अपना कार्य शुरू कर दिया था, विभिन्न विषयों पर चर्चा होने लगी थी जैसे मौलिक अधिकार, भाषा आदि! इन्हीं प्रस्तावों के बीच एक दिन आरक्षण का भी मुद्दा उठाया गया। इस विषय पर चर्चा के थोड़ी ही देर बाद पता चल गया कि सभा के ज्यादातर सदस्य इसके खिलाफ थे। 

उस दिन की कार्यवाही समाप्त होने के बाद के.एम. मुंशी जो संविधान सभा के एक वरिष्ठ और विद्वान् सदस्य थे, ने डॉ अम्बेडकर को अपने पास बुलाया और कहा कि शायद आरक्षण देश के लिए ठीक नहीं होगा और चूँकि कांग्रेस के भी ज्यादातर सदस्य इसके खिलाफ ही हैं तो क्यों ना आप इसे संविधान से निकाल ही दें।

मुंशी जी का इतना कहना ही था कि बाबा आंबेडकर चिल्ला उठे और जोर से कहा कि जब तक मैं यहाँ हूँ, संविधान में आरक्षण रहेगा जब आप लोगों को मुझसे इतना घृणा ही है तो में अपना इस्तिफा दे दूंगा। और इस प्रकार उन्होंने संविधान सभा का अपना काम बंद कर दिया और घर बैठ गए।

इन सब बातों की जानकारी जब सरदार पटेल को हुई तो वह बाबा अम्बेडकर के घर गए और उनका पक्ष जानने का प्रयास किया और कहा कि आप क्यों सब काम छोड़कर घर बैठे हुए हैं। डॉ अम्बेडकर ने फिर वही आरक्षण वाली अपनी बात दोहराई, सरदार पटेल ने तब साफ़ कहा कि देखो अम्बेडकर जो बड़े पद हैं उन पर तो हम मेरिट के आधार पर ही लोगों का चयन करेंगें फिर क्यों तुम क्लर्कों के पद के लिए इतना बड़ा जोखिम उठा रहे हो।

डॉ अम्बेडकर ने कहा कि कैसा जोखिम पटेल जी?

उस पर सरदार पटेल ने कहा कि देखो अगर आज हम अछूतों (sc,st ) को आरक्षण दे देते हैं तो फिर हर समुदाय जैसे मुस्लिम, सिख, इसाई,और हिन्दुओं की अन्य जातियां आदि सभी आरक्षण की मांग करने लगेगें और देश में जाति और धर्म की ये तकरार लगातार बढ़ती जायेगी और जिस जाति व्यवस्था को हम भारत से मिटाना चाहतें हैं वो तो और भी मजबूत हो जायेगी।

(सोच के देखिये सरदार पटेल की दूरदर्शिता आज आरक्षण के नाम पर देश में क्या हो रहा हैं)

सरदार पटेल की हर बात का डॉ अम्बेडकर ने खंडन किया और अपना कानून मंत्री का इस्तीफा उनको सौंप दिया, एक जाति मुक्त भारत, अन्याय मुक्त भारत और दलितों के प्रति अपनी उदारवादी सोच की वजह से, बड़े बड़े राजाओं के सामने भी ना झुकने वाला यह लौह स्तम्भ अपने जीवन में पहली बार डॉ अम्बेडकर के सामने झुक गए और उनका इस्तीफा नहीं स्वीकारा।

( शायद ये आजाद भारत की सबसे पहली ब्लैकमेलिंग थी), और इस प्रकार भारत में आरक्षण का सूत्रपात हो गया।

लेकिन जब भारत का संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, तो उसके मौलिक अधिकार वाले भाग 3 में अनुच्छेद 15 स्पष्ट घोषणा कर रहा था कि धर्म, लिंग, जाति, जन्मस्थान के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा और आरक्षण तो यही कर रहा है, अत: भारत का पहला (1) संविधान संशोधन लाया गया जो अनु. 15 (4) कहा गया।

जिसने स्पष्ट घोषणा कर दी कि इस अनु. यानी 15 और अनु. 29 (2) की कोई भी बात राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े नागरिकों के किन्ही वर्गों और sc,st के लिए विशेष उपबंध यानी आरक्षण देने से नहीं रोकेगी।

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